इश्क़

कम हो कर भी बहुत है, 
ये इश्क़ भी एक मीठा ज़हर है

न होने पर दर्द से खामोश है, 
होकर भी दर्द में खामोश है,

क्या बला है ? क्या दवा है ?
या फिर बस चन्द लम्हों का सहर है ?

एक दुआ है या रज़ा है ?
या फिर एक सज़ा है ?

ज़हर नहीं तो और क्या है
सब तरफ है फिर भी ज़रा है

कहने को बहुत आशिक हैं लुटे
पर फिर भी इसी की खता है

ये इश्क ही है ऐ दोस्त
जो कल भी फ़ना था…..आज भी फ़ना है

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