देखा है.…

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मैंने देखा है.…
सूरज ढलते देखा है;
अँधेरा बढ़ते देखा है ;
सवेरा होते देखा है ;
शाम में रंगों को घुलते देखा है;
माँ के आँचल से इत्मिनान देखा है;
पिता की डांट का सबक देखा है;
स्वदोष का ज़हर, अपनों को पीते देखा है;
आँखों को बंद कर, कमियों को ढाल बनते देखा है;
मय के प्याले से, गुलज़ार महफिलों में,
ग़मों को बरबस जलते देखा है;
एक बात से, एक मुलाकात से,
इश्क होते देखा है;
अगर फीका पड़ गया तो, रंगों को हाथों से,
यारों को भरते देखा है;
आज को कल में,
कल को पल में,
बदलते देखा है||
बस इतना सा ही देखा है…
बस ज़िन्दगी में यही देखा है,
बस ज़िन्दगी को नहीं देखा है !!

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