आखिरी ख़त

मुझ में थोड़ी मोहब्बत अभी बाकी है 
नैनों की भाषा थोड़ी अभी भी समझ आती है 

देखता हूँ दूर से आज भी वो निशाँ
जो मेरी आप बीती पर घाव के अभी बाकी हैं
कहने को कुछ नहीं क्या तुम्हे सुनाऊं
एक खूबसूरत मोड़ नज़र आना बाकी है
समझा सके जो मेरी उलझन किसी को
इस कलम से निकलने वो अलफ़ाज़ अभी बाकी हैं
कुछ समय पहले वक़्त भी अजीब था
तू यहाँ थी मेरी ज़िन्दगी में, मैं तेरा रकीब था
क्या आगे होगा जानने की कोशिश ही न क़ी
क्यूंकि वहीँ मेरी ज़िन्दगी का ठहराव हसीन था
अब वो दिन है जब मुझे ऐसा लगता है
मानो वो जूनून भी ख्वाब का एक हिस्सा है
खुश रहो तुम यही मेरी दुआ बाकी है
क्यूंकि अब भी मेरे लफ्ज़ नहीं काफी हैं
अलविदा कह रहा हूँ एक बार फिर
शायद मुलाक़ात हो न हो
ख़त तो नहीं पर यही कुछ नज्में हैं बाकी
उम्मीद है इनसे तुम्हे ख़ता न हो
जश्न है तुम्हारा मैं नहीं हूँ फिर वहां
ख़ुशी में तुम्हारी अब शरीक होने लायक नहीं
याद रखो तो शायद कुछ सुकून मिले
इस तन्हाई में अब और कोई बाकी नहीं
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3 thoughts on “आखिरी ख़त

  1. Kuch bhi kaho bhai, kafi achcha likha hai. Log aksar likhte hue bhatak jaate hain, jo likhna chahte hain wo likh nahi pate hain, jo chaho, wahi likhna aur use is tarah likna kabil-e-tareef hai. 😛

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