ये परिंदा …

डूबा सा था मैं आज अपने कल के ख्यालों में,
उड़ता दिख रहा था मुझे मेरा अक्स वहां,
उस अथाह आसमां के आगोश में बहती हवाओं को समेटता 

के फ़िर समझ आया आज मैं क्या हूँ,
के दिखा मुझे आइना अपना,
देखा मैंने लैपटॉप के सामने झुकी मेरी परछाई को,
जो किसी तरह बस झलक दिखा रही थी 
कहते हैं हम के ये हिन्दोस्तां आज़ाद है,
ये नहीं देखते के आज भी,
तुम वही गुलामी करते हो; जरिया अलग है,
तुम उतना ही तरसते हो … लालसा अलग है

ध्यान से देखो चारो ओर कितना उजाला है
अपनी गहराई तले झाँको सच से कितना फासला है,
ये रौशनी ही है जो तेरे आसेब को दबाती है
तुझे एक भ्रम में ले जाती है

पर तू है उस पिंजरे में कैद परिंदे की तरह
दीवारों से टकराता है जो घायल होने के लिए,
पर जान ले ऐ नश्वर स्वामी; एक वक़्त वो भी आएगा,
जब तेरा ये पिंजरा भी उसे रोक न पायेगा

फिर ये परिंदा भी आज़ाद हो जायेगा
अपने आसमां के आगोश में
उन बहती हवाओं को समेट पायेगा
ये परिंदा …. उड़ जाएगा, उड़ जाएगा, उड़ जाएगा !!

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